• राजेश मिश्र
इंट्रो
भारतीय राजनीति में एक सवाल उठ रहा है- मोदी नहीं तो कौन? इन दिनों ंप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में जनसैलाब जुटाने, बड़ी-बड़ी रैलियां करने और भीड़ के जरिए राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिशें जारी हैं। लेकिन सवाल है कि क्या भीड़ जुटाना ही राजनीतिक सफलता का पैमाना है? लोकतंत्र में रैलियां और विरोध प्रदर्शन जनता का अधिकार हैं। किसी मैदान में लाखों लोगों का जुटना किसी मुद्दे पर जनसमूह की एकजुटता जरूर दर्शाता है, लेकिन इसे पूरे देश की जनभावना नहीं माना जा सकता। जनता का असली फैसला रैलियों में नहीं, मतदान केंद्रों पर होता है। भीड़ जुटाना और देश चलाना दो अलग-अलग बातें हैं। जनता केवल नारों से नहीं, बल्कि नेतृत्व, नीतियों, कामकाज और भविष्य की उम्मीदों को देखकर अपना फैसला करती है।विपक्षी दलों की राजनीति का बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने पर केंद्रित दिखाई देता है। लेकिन लोकतंत्र केवल किसी नेता को हटाने की इच्छा से नहीं चलता। लोकतंत्र में विकल्प, विचार, नेतृत्व, नीतियां और भविष्य की स्पष्ट दिशा भी जरूरी होती है। जनता जानना चाहती है कि मोदी नहीं तो देश की बागडोर किसके हाथों में होगी? हांलाकि लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना विपक्ष का अधिकार भी है। लेकिन इस पूरी मुहिम के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है-मोदी नहीं तो कौन? आज विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके पास मोदी विरोध के अतिरिक्त कोई ऐसा सर्वमान्य नेतृत्व दिखाई नहीं देता, जिसके नाम पर सभी दल सहजता से सहमत हो सकें। हर दल का अपना नेता है, अपनी महत्वाकांक्षा है और अपने राजनीतिक समीकरण हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि सभी दल मिलकर सत्ता में आते हैं तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा? क्या इस पर कोई सहमति है? क्या देश को एक स्थिर और निर्णायक सरकार देने की कोई ठोस योजना है? सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए, लेकिन जब देश के नेतृत्व का प्रश्न सामने हो, तब केवल विरोध के आधार पर विकल्प तय नहीं किया जा सकता। विकल्प के पास दृष्टि होनी चाहिए, अनुभव होना चाहिए, संगठन होना चाहिए और देशको आगे ले जाने की स्पष्ट इच्छाशक्ति होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि उन्होंने भारतीय राजनीति में नेतृत्व की एक ऐसी शैली स्थापित की है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट दृष्टिकोण दिखाई देता है।
भाजपा की ताकत केवल मोदी नहीं
यह मानना गलत होगा कि भाजपा की पूरी ताकत केवल एक व्यक्ति पर आधारित है। नरेंद्र मोदी उसका सबसे बड़ा चेहरा अवश्य हैं। भाजपा की ताकत नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के साथ उसका मजबूत संगठन और दशकों पुरानी वैचारिक विरासत भी है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने पार्टी की नींव मजबूत की। अटल जी ने गठबंधन राजनीति में नेतृत्व दिया, तो मोदी जी ने निर्णायक नेतृत्व की पहचान बनाई। यही संगठन, विचारधारा और नेतृत्व की परंपरा भाजपा की असली ताकत है।
मोदी बनाम विपक्ष, नेतृत्व की कसौटी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति की प्रमुख विशेषता उनका स्पष्ट नेतृत्व, सीधा जनसंपर्क और योजनाओं के जरिए विकास पर जोर रहा है। उन्होंने अपनी राजनीतिक शैली को योजनाओं, राष्ट्रीय मुद्दों और मजबूत नेतृत्व की छवि के साथ जोड़ा है। देखा जाये तो भारत का इतिहास मजबूत नेतृत्व के महत्व का साक्षी है। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव मजबूत की। लाल बहादुर शास्त्री ने कठिन समय में सादगी, साहस और राष्ट्रीय स्वाभिमान का परिचय दिया। इंदिरा गांधी के दौर में देश ने जहां बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव देखे, वहीं 1975 में आपातकाल के रूप में लोकतंत्र का एक अत्यंत कठिन अध्याय भी देखा। इसलिए भाजपा की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए उसके संघर्ष और वैचारिक विरासत को याद करना जरूरी है। भाजपा की इस वैचारिक विरासत को याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भाजपा केवल सत्ता में आने वाली पार्टी नहीं है। उसकी अपनी वैचारिक और राजनीतिक यात्रा है।
संगठन से शासन तक का सफर
गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर अचानक प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की कहानी नहीं है। उन्होंने संगठन में लंबे समय तक काम किया है, पार्टी के लिए जिम्मेदारियां निभाईं है और गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया है। 2014 में देश ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में चुना। 2019 में जनता ने दोबारा विश्वास जताया और 2024 में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को फिर सरकार बनाने का जनादेश मिला।
इसलिए मानना चाहिये कि विकल्प का प्रश्न किसी व्यक्ति की लोकप्रियता या राजनीतिक परिवार की विरासत से तय नहीं हो सकता। उसे अपनी क्षमता और नीतियों के आधार पर जनता के सामने खरा उतरना होगा।
किसी सरकार की आलोचना और उसके विकल्प की प्रस्तुति दो अलग-अलग बातें हैं। केवल कमियां गिनाने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। जनता यह भी देखना चाहती है कि जो लोग सत्ता में आने का दावा कर रहे हैं, उनके पास समस्याओं का समाधान क्या है? आज भी यदि विपक्षी एकता का आधार केवल मोदी को हटाना है, तो सत्ता मिलने के बाद नेतृत्व और नीतियों को लेकर मतभेद उभरने की आशंका स्वाभाविक है। देश को प्रयोगशाला बनाकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं की जा सकती। यह मानना भी गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र में कोई नेता अपरिहार्य नहीं होता। सत्ता स्थायी नहीं होती। नरेंद्र मोदी भी इस लोकतांत्रिक कसौटी से अलग नहीं हैं। लेकिन यदि विपक्ष वास्तव में सत्ता परिवर्तन चाहता है तो उसे जनता के सामने एक विश्वसनीय विकल्प रखना होगा। देश को यह बताना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर उसकी नीति क्या होगी? आर्थिक विकास की गति कैसे बढ़ेगी? युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कैसे पैदा होंगे? किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्या योजना होगी? वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को लेकर उसकी सोच क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वह राजनीतिक असहमति के बावजूद एक स्थिर सरकार चला सकेगा? किसके पास राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता है? किसके पास शासन चलाने का अनुभव है? कौन देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखता है? इन सवालों के जवाब नारों से नहीं, ठोस नीतियों और विश्वसनीय नेतृत्व से मिलेंगे। इसलिए आज का सवाल केवल यह नहीं है कि मोदी को हटाना चाहिए या नहीं। असली सवाल है कि मोदी के बाद देश किस दिशा में जाएगा? कौन उस दिशा का नेतृत्व करेगा? और क्या विपक्ष के पास देश को एकजुट रखकर आगे बढ़ाने की कोई साझा योजना है? राजनीति में किसी व्यक्ति का विकल्प हो सकता है, लेकिन विकल्प केवल नाम नहीं होता। उसके पीछे विचार, दृष्टि, नेतृत्व और भरोसा होना चाहिए।
इसीलिए विपक्ष की मोदी हटाओ मुहिम के बीच देश का एक बड़ा राजनीतिक सवाल आज भी अपनी जगह कायम है, मोदी नहीं तो कौन? देश को प्रधानमंत्री बनाने के लिए केवल भाषण नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुभव चाहिए। केवल गठबंधन नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रीय दृष्टि चाहिए। केवल चुनावी नारे नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, विदेश नीति, कृषि, शिक्षा और रोजगार के लिए स्पष्ट कार्यक्रम चाहिए। आज जब सवाल उठता है कि मोदी नहीं तो कौन? तो इसका जवाब केवल किसी दूसरे नेता का नाम लेकर नहीं दिया जा सकता। मोदी नहीं तो कौन? यह सवाल पूछने वालों से एक सवाल और हैकृ केवल मोदी का विकल्प बताना काफी नहीं, क्या आपके पास मोदी से बेहतर भारत बनाने की स्पष्ट योजना भी है? कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये कि भारत को केवल सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की आवश्यकता है। और भाजपा समर्थकों का विश्वास है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत उस भविष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ सकता है।
• लेखक के अपने विचार हैं।