Thursday, April 2, 2026
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युद्ध के शोर में सियासत और बाजार का अदृश्य गठजोड़

पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी असर डाल रहा है। आज किसी भी बाजार में कदम रखिए, हर दुकानदार के पास एक तैयार जवाब है, ‘भैया, युद्ध चल रहा है, इसलिए सब महंगा हो गया है।’ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, बाजारों में अस्थिरता और रोजमर्रा की चीजों पर बढ़ता बोझ, सब कुछ जैसे एक ही कहानी बयान कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है, क्या महंगाई सचमुच सिर्फ युद्ध का नतीजा है, या इसके पीछे वैश्विक राजनीति और बाजार की कोई गहरी चाल भी छिपी है? कहीं ‘युद्ध’ अब हर बढ़ती कीमत का आसान बहाना तो नहीं बन गया है?
अभी कल की ही बात है। बाज़ार की चहल-पहल के बीच मैं टाइल्स की उसी दुकान पर पहुंचा, जहां से एक महीने पहले 400 रुपये में टाइल्स खरीदी थीं। इस बार वही टाइल्स 500 रुपये की बताई गईं।
मैं ठिठक गया। हल्की मुस्कान के साथ दुकानदार से कहा, ‘अभी पिछले महीने ही तो आपने 400 में दी थी, अब सीधा साढ़े पांच सौ?’
दुकानदार ने मेरी ओर देखा, चेहरे पर न कोई झिझक, न कोई हिचक। बड़े आराम से बोला, ‘भैया, आप तो बड़े पत्रकार हो, जानते ही हो, युद्ध चल रहा है, इसलिए महंगा हो गया है।’
उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास था, जैसे यह जवाब नहीं, एक तयशुदा तर्क हो। मैं कुछ पल चुप रहा, लेकिन भीतर सवालों का शोर उठने लगा। क्या सचमुच हर बढ़ती कीमत के पीछे ‘युद्ध ही जिम्मेदार है, या फिर यह एक ऐसा जुमला बन गया है, जो हर बढ़ोतरी को जायज़ ठहराने के लिए आसानी से इस्तेमाल किया जा रहा है?
उस पल लगा, ‘युद्ध अब सिर्फ सरहदों पर नहीं लड़ा जा रहा, वह बाजार की हर गली, हर दुकान और हर कीमत में भी मौजूद है, एक अदृश्य कारण बनकर, जिसे कोई परख नहीं सकता, लेकिन हर कोई मान लेता है।
सच यह है कि जब भी दुनिया के किसी कोने में युद्ध की आग भड़कती है, उसकी लपटें सीमाओं में कैद नहीं रहतीं, वे धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी तपिश में झुलसा देती हैं। इजरायल-ईरान युद्ध का एक महीना पूरा हो चुका है, जिसके चलते अब तक 4,500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें अकेले ईरान में 1,900 से अधिक मौतें शामिल हैं। संघर्ष ने तेल की कीमतों को प्रभावित किया है बल्कि पूरी दुनिया में महंगाई भी बढ़ रही दिया है।
यह युद्ध भले ही हजारों किलोमीटर दूर क्यों न हो, उसका पहला असर अर्थव्यवस्था पर पडता ही़ है। कच्चे तेल की कीमतें प्रभावित होती हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देश की कमर टूटने लगती है। महंगाई बढ़ती है, आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ता है, रसोई से लेकर सड़क तक हर चीज महंगी हो जाती है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा, और कहीं अधिक चिंताजनक पहलू भी है। महंगाई हर बार युद्ध की देन नहीं होती; कई बार इसके कारण हमारे अपने स्थानीय बाज़ार में ही छिपे होते हैं, जमाखोरी, कृत्रिम कमी, बढ़ा हुआ मुनाफा या जटिल टैक्स ढांचा। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक, “युद्ध” का हवाला देकर कीमत बढ़ा देना एक आसान रास्ता बन जाता है। वजह साफ है, ग्राहक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से भयभीत होता है और सवाल पूछने से हिचकता है।
हकीकत यह है कि कई मामलों में लागत में सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, लेकिन कीमतें 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा दी जाती हैं। जानकारी के अभाव में ग्राहक असहाय रहता है, जबकि दुकानदार के पास एक तैयार जवाब होता है, “ऊपर से महंगा आ रहा है।’
इसका सबसे बड़ा असर आम आदमी पर पड़ता है। वह पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, और उसकी आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, जितनी तेजी से रोजमर्रा की जरूरतों के दाम बढ़ते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप, उसका बजट लगातार असंतुलित होता जाता है और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी बोझ लगने लगती हैं।
हांलाकि, नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार लगातार यह प्रयास करती रही है कि वैश्विक संकट का सीधा असर आम जनता पर कम से कम पड़े, चाहे पेट्रोल-डीजल पर करों में राहत देना हो या आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को संतुलित रखना। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि हर स्तर पर नियंत्रण संभव नहीं होता।
असल चुनौती “युद्ध” और “मुनाफाखोरी” के बीच की महीन रेखा को पहचानने की है। महंगाई का पूरा सच केवल अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में नहीं छिपा, बल्कि हमारे अपने बाज़ार के व्यवहार में भी समाया हुआ है। गौरतलब है कि यदि हर बढ़ती कीमत को बिना सवाल किए ‘युद्ध’ के खाते में डाल दिया जाएगा, तो यह धीरे-धीरे एक स्थायी बहाना बन जाएगा।
इसलिए ज़रूरत एक जागरूक उपभोक्ता की है, जो सवाल पूछे, समझे और यह फर्क कर सके कि कौन-सी महंगाई वास्तविक मजबूरी है और कौन-सी केवल एक गढ़ी हुई कहानी। कहना गलत नहीं होगा कि हर महंगाई युद्ध की देन नहीं होती; कुछ महंगाई हमारे अपने बाज़ार की ही उपज होती है।
बहरहाल, भारत के लिए यह दौर सिर्फ चुनौतियों का नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने का भी है। हाल ही में लोकसभा में नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत शांति, संवाद और कूटनीति के रास्ते पर अडिग है। उनका संदेश साफ था, युद्ध कभी समाधान नहीं होता; स्थायी रास्ता केवल बातचीत और संतुलित कूटनीतिक प्रयासों से ही निकलता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला की मजबूती और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में हैं।
दरअसल, भारत की सोच हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की रही है। दुनिया के किसी भी कोने में उठती हिंसा यहां भी बेचैनी पैदा करती है। यही कारण है कि भारत सिर्फ दर्शक नहीं बनता, बल्कि शांति, मानवीय सहायता और संतुलन की आवाज़ बनकर सामने आता है।
गौरतलब है कि भारत के लिए यह समय केवल चुनौतियों का नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक भूमिका को और मजबूत करने का भी है। ऐसा मानना चाहिए कि युद्ध के इस दौर में भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में अपने कदम तेज करेगा। क्योंकि बदलती दुनिया में वही देश सुरक्षित और सशक्त रहेगा, जो अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होगा।

राजेश मिश्र

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